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मध्य प्रदेश विधानसभा: इस शहर में दलित नहीं है चुनावी मुद्दा, बल्कि दलितों के खिलाफ होती है राजनीती

मध्य प्रदेश राज्य में एक शहर है महू। यह शहर इस लिए भी विशेष है क्योकि यहाँ पर दलितों के मसीहा और भारत के संबिधान निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर का जन्म हुआ था। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव सिर पर है। ऐसे में इन महू के दलितों पर न तो भाजपा की नज़र जा रही है और न ही कांग्रेस भले ही इनके वादों के फेहरिस्त में दलितों और गरीबों के लिए बड़े-बड़े वादे किये जा रहे हैं।





घर के साथ इन्दगी भी है अँधेरे में

मिडिया जब इन इलाकों का जायजा लेने गयी तो वहां उसने ऐसे घरों को देखा जहाँ ऐसी झोपड़ियों में लोग रहते थे जहाँ न तो शुद्ध हवा मिलती थी और न ही सही से धूप एक झोपडी में रस्सी पर कपडे टंगे थे और एक और कामनीबाई थी ज्सिने बताया की हमारी याद सरकार को नहीं आती  कामनीबाई के घर के एक कोने में बाबा साहेब अंबेडकर की फोटो भी लगी थी




कामनीबाई ने अपना पेशा बताते हए कहा कि, ''मैं कूड़ा उठाकर पैसे कमाती हूँ। मेरी बेटी यहां आई है लेकिन मेरे पास ​उसे साड़ी दिलाने के पैसे नहीं है। मुझे उधार लेना पड़ेगा लेकिन ब्याज़ चुकाने में बहुत मुश्किल आती है। मुझे उसे साड़ी देनी होगी इसलिए अब सोच रही हूं कि कहीं और से पैसे मिल जाएं।''
ऐसी स्थिति केवल कामनीबाई की नहीं है यहाँ रहने वाले हर घर का यही हाल है ज्यादातर लोग कूड़ा उठा कर और घरो में सफाई करके घर चलाते हैं।
इसके बाद मीडिया कर्मी स्थानीय दलित नेता मोहनराव वाकोड़े के पास गए और लोगों के इस हाल के बारे में बात की

दलित यहाँ मुद्दा ही नहीं

इंदौर से सटे महू शहर की कुल जनसंख्या एक लाख है जिनमें से 15 फीसदी अनुसूचित जाति से हैं। इन 15 फीसदी में से करीब 5000 महाराष्ट्र से आप्रवासी हैं जो महू में रहने लगे हैं। अधिकतर आप्रवासी अकोला या उसके आसपास के इलाकों से हैं।
महू में कामनीबाई और अन्य दलितों की बदहाली, मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की झलक देती है। दूसरे राज्यों के मुक़ाबले मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की ख़ास जगह नहीं है। बीजेपी और कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दलितों के लिए कई वादे किए हैं। लेकिन, असल चुनावी अभियान में दलित मुद्दा केंद्र में तो छोड़ो उसके आसपास भी नहीं है।




स्थानीय अख़बार 'ब्लैक एंड व्हाइट' के संपादक प्रकाश हिंदुस्तानी कहते हैं, ''इस क्षेत्र में दलित राजनीति अपने आप में पिछड़ी हुई है। इस राज्य में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसी दलित राजनीति नहीं होती। यहां ग्रामीण और कृषि संबंधी मुद्दे प्रमुख हैं। आदिवासियों की जनसंख्या ज़्यादा है। यहां तक कि भानुसिंह सोलंकी जैसा सिर्फ़ एक नेता उप-मुख्यमंत्री के पद पर पहुंच पाया है। और किसी को ऐसी सफलता नहीं मिली।”
पिछले विधानसभा चुनावों में मायावती की बसपा के चार विधायक जीते थे ​पार्टी को सिर्फ 6.5 प्रतिशत वोट मिले थे।
प्रकाश हिंदुस्तानी मानते हैं, कि ''अनुसूचित जाति के लोग चुप रहने वाले मतदाता हैं। वह आमतौर पर सामने नहीं आते हैं लेकिन पोलिंग के दौरान पूरी तरह काम करते हैं। 'सपाक्स' और 'जयास' यहां उभरकर आए हैं लेकिन बीएसपी को अब भी बढ़त हासिल है।'
मध्य प्रदेश विधानसभा: इस शहर में दलित नहीं है चुनावी मुद्दा, बल्कि दलितों के खिलाफ होती है राजनीती मध्य प्रदेश विधानसभा: इस शहर में दलित नहीं है चुनावी मुद्दा, बल्कि दलितों के खिलाफ होती है राजनीती Reviewed by हिंदी न्यूज़ on November 23, 2018 Rating: 5

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